सब्ब सुखगाथा

सब्ब सुखगाथा

सब्बे सत्ता सेखी होन्तु, सब्बे होन्तु च खेमिनो ।
सब्बे भद्रानि पस्सन्तु, माकच्चि दुक्खमागमा ।।1।।

यानी’ध भूतानी समागतानि भूम्मानि वायानिव अन्त लिक्खे
सब्बेव भूता सुमना भवंतु अथो पि सक्कच्च सुणंतु भासित ।।2।।

तस्मा हि भूता निसामेथ सब्बे मेतं करोथ मानूसिया पजाय ।
दिवाच रत्तोच हरंति ये बलि तस्मा हिने रक्खथ अप्प मत्ता ।।3।।

रतन सुत्त


यानीध भूतानि समागतानि । भूम्मानि वा यानि’व अन्तलिक्खे ।
तथागतं देव मनुस्स पूजितं । बुध्द नमस्साम सुवत्थि होतु ।। 1।।


यानीध भूतानि समागतानि । भूम्मानि वा यानि’व अन्तलिक्खे ।
तथागतं देव मनुस्स पूजितं । धम्मं नमस्साम सुवत्थि होतु ।।2।।


यानीध भूतानि समागतानि । भूम्मानि वा यानि’व अन्तलिक्खे
तथागतं देव मनुस्स पूजितं । संघं नमस्साम सुवत्थि हितु ।।3।।


यानीध भूतानि समागतानि । भूम्मानि वा यानि’व अन्तलिक्खे ।
सब्बेव भूता सुमना भवंतु । अथोपि सक्कच्च सुणंतु भासितं ।।4।।


तस्मा हि भूता निसा मेथ सब्बे । मेतं करोथ मानुसिया पजाय ।
दिवा च रत्तोच हरंति ये बलिं । तस्मा हि ने रक्खथ आप्प मत्ता ।।5।।


यं किच्चि वित्तं इधं वा हुरं वा । सग्गोसु वा यं रतनं पणीतं ।
न नो समं अत्थि तथागतेन । इदं म्पि बुध्दे रतनं पणीतं ।
एतेन सच्चेन सुवम्थि होतु ।।6।।


खयं विरागं अमतं पणीतं । यद ज्झगा सक्यमुनी समाहितो
न मेन धम्मेन समात्थि किच्चि । इदं म्पि धम्मे रतनं पणीत ।
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।। 7।।


ये बुध्द सेठ्ठो परिवण्णायि सुचिं । समाधि मानंतरिक यामाहू ।
समाधिना तेन सभा न विज्जति । इदं म्पि धम्मे रतनं पणीतं ।
एतेन सच्चेन सुवत्थि होमु ।।8।।


ये पुग्गला अठ्ठ सतं पसत्था । चत्तारी युतानि युगानि होन्ति ।
ते दक्खिणेय्या सुगतस्स सांवका । एतसु दिन्नानि महात्फलानि ।
इदंऽम्पि संघे रतनं पणीतं । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।।9।।


ये सुप्पयुत्त मनसा दळहेन । निक्कामिनो गौतम सासनम्हि ।
ते पत्तिपत्ता अमतं विगयंह । लध्दा मुधा निब्बुति भुज्जमाना ।
इदंऽम्पि संघे रतनं पणीतं । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।। 10।।


यथिन्द खीलो पठविं सितोसिया । चतुब्भि वातेहि असम्पक म्पियो ।
तथूपमं सप्पुरिसं वदामि । यो अरिय सच्चानि अवेच्च पस्स्ति ।
इदंऽम्पि संघे रतनं पणीतं । एतेन सचचेन सुवत्थि होतु ।। 11।।


ये अरिय सच्चानि विभावयंति । गंभार पव्म्अेन सुदेसितानी ।
किच्चापिते होन्ति भुसप्प मता । न ते भवं अठ्ठमं आदियंति ।
इदंऽम्पि संघे रतनं पणीत । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।। 12।।


सहाव’स्स दस्सन संपदाय । तयस्सु धम्मा जहिता भवंति ।
सक्काय दिठ्ठि विचि किच्छितं च । सीलब्बतं’ वापि यदत्थि किच्चि ।
चतूह पायेहि च विप्पमुतो । छ चभिठानानि अभब्बो कांतु ।
इदंऽम्पि संघे रतनं पणीतं । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।। 13।।


किच्चापि सो कम्म करोति पापकं कायेन वाचाउद चेमसा वा ।
अभब्बो सो तस्सा पटिच्छदाय । अभब्बता दिठ्ठ पदस्स वुत्ता ।
इदंऽम्पि संघे रतनं पणीतं । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।। 14।।


वनप्प गुम्बे यथा फुस्सितग्गे । गिम्हाणमासे पठमस्मिं गिम्हे ।
त्तथूपमं धम्म वरं अदेसयि । निब्बाण गामिं परम हिताय ।
इदंऽम्पि बुध्दे रतनं पणीतं । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।। 15।।


वरो, वरयू, वरदो वराहरो । अनुत्तरो धम्मवरं अदेसयि ।
इदंऽम्पि बुध्दे रतनं पणीतं । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।। 16।।


खीण पुराणं नव नत्थि संभवं । विरत्त चित्ता आयतिके भवस्मि ।
ते खीण बीजा अविरुळ ह छंन्दा । निब्बन्ति धीरा । यथा’यं पदीपो
इदंऽम्पि संघे रतनं पणीतं । एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु ।। 17।।

हिंदी अर्थ

जो सभी प्राणी यहां इकट्ठे हुए हैं, चाहे वे भूमि में हों या आकाश में,
भगवान को, देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजा जाने वाला,
हम भगवान को नमन करते हैं, उन्हें शुभ और कल्याणकारी हो।

जो सभी प्राणी यहां इकट्ठे हुए हैं, चाहे वे भूमि में हों या आकाश में,
भगवान को, देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजा जाने वाला,
हम धर्म को नमन करते हैं, धर्म को शुभ और कल्याणकारी हो।

जो सभी प्राणी यहां इकट्ठे हुए हैं, चाहे वे भूमि में हों या आकाश में,
भगवान को, देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजा जाने वाला,
हम संघ को नमन करते हैं, संघ को शुभ और कल्याणकारी हो।

जो सभी प्राणी यहां इकट्ठे हुए हैं, चाहे वे भूमि में हों या आकाश में,
सभी प्राणी शुभमना हों, और यदि वे सुनें, तो जो भी कहा गया है, उसे समझें।

इसलिए सभी प्राणियों को शुभकामनाएं देते हुए,
मनुष्यों से अच्छा कार्य करने की प्रेरणा दें।
दिन और रात में जो बलि चढ़ाते हैं, उन्हें अपने आत्म-संयम को बनाए रखना चाहिए।

जो भी सामग्री इधर है या उधर, वह चाहे स्वर्ग में हो या पृथ्वी पर,
वह सब कुछ, जो तथागत के द्वारा बताया गया है,
यह सब भी भगवान के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो विराग और अमृत की ओर अग्रसर होते हैं,
जिन्होंने ध्यान में विश्राम किया है,
वे अमरता की प्राप्ति करते हैं,
यह भी धर्म के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो व्यक्ति ध्यान में सशक्त होते हैं,
उनका मानसिक संतुलन स्थिर होता है,
और उनके विचारों में कोई विक्षोभ नहीं होता,
यह भी धर्म के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो व्यक्ति पूर्ण रूप से अपने मार्ग पर दृढ़ होते हैं,
वे अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं,
यह भी संघ के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो लोग साधना के माध्यम से निंदा और आलोचना से दूर रहते हैं,
वे अवश्य ही अवबोधन को प्राप्त करते हैं,
यह भी संघ के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो लोग सत्य के मार्ग को अनुसरण करते हुए
ध्यान में लीन रहते हैं,
उनका जीवन सफल होता है,
यह भी संघ के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो लोग सत्य के संदेशों को समझते हुए
उनका अभ्यास करते हैं,
वे सद्गति की प्राप्ति करते हैं,
यह भी संघ के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो व्यक्ति बिना किसी भ्रम के
धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं,
वह निश्चित रूप से परम सुख की ओर बढ़ते हैं,
यह भी संघ के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति ईमानदार रहते हैं,
वह उन कर्मों के परिणामों से मुक्त होते हैं,
यह भी संघ के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जैसे जंगलों में उगने वाले फूलों से ही
वास्तविक सौंदर्य प्रकट होता है,
वैसे ही हम लोग भी सच्चे धर्म का पालन करें,
यह भी बुद्ध के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो अपने चित्त को वश में रखते हुए
सम्पूर्ण संसार से अज्ञात रहते हैं,
वे जीवन में उत्तम स्थिति प्राप्त करते हैं,
यह भी बुद्ध के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।

जो व्यक्ति अपने पुराने कर्मों को छोड़कर
नए मार्ग पर ध्यान केंद्रित करते हैं,
वह निसंदेह नीरवता की प्राप्ति करते हैं,
यह भी संघ के रत्नों में समाहित है,
सच्चाई से शुभ हो।